ठप पड़ रही ‘एक स्टेशन–एक उत्पाद’ योजना
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रेलवे की नीति बन रही बाधा, तीन माह में बदलते हैं संचालक, यात्रियों तक नहीं पहुंच पा रहे स्थानीय उत्पाद
राजेश वर्मा
उदयपुर, 22 सितम्बर: स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने और कारीगरों को रोजगार देने के उद्देश्य से रेलवे मंत्रालय ने करीब डेढ़ वर्ष पहले ‘एक स्टेशन–एक उत्पाद’ योजना की शुरुआत की थी। लेकिन, इस महत्वाकांक्षी योजना का हाल यह है कि उदयपुर सिटी और राणा प्रतापनगर रेलवे स्टेशन पर लगाए गए स्टॉल यात्रियों को आकर्षित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है तीन माह की अल्पावधि आवंटन नीति, जिसके कारण न तो कोई संचालक कारोबार जमा पाता है और न ही यात्रियों तक उत्पाद पहुँच पाते हैं।
स्टॉल संचालक दीपक मीणा ने बताया कि आवेदन और शुल्क जमा करने के बाद बड़ी मशक्कत से स्टॉल मिलता है, मगर यह केवल तीन माह के लिए ही दिया जाता है। इस दौरान संचालकों को केवल स्थानीय हैंडीक्राफ्ट और पारंपरिक उत्पाद बेचने की अनुमति होती है। लेकिन मुश्किल यह है कि तीन माह में ही कारोबार जमने लगता है और तभी अवधि पूरी हो जाती है। नतीजतन स्टॉल किसी नए संचालक को सौंपना पड़ता है और पूर्व में किया गया परिश्रम व्यर्थ चला जाता है। अब तक उदयपुर में आठ से दस संचालक बदले जा चुके हैं, मगर किसी को भी सफलता नहीं मिली।
यात्रियों के पास समय नहीं, बिक्री पर असर
स्टेशनों पर आने-जाने वाले यात्री अक्सर जल्दी में होते हैं। राणा प्रतापनगर जैसे छोटे स्टेशनों पर तो ट्रेनों का ठहराव मात्र दो मिनट का रहता है। ऐसे में यात्री रुककर खरीदारी नहीं कर पाते। दीपक मीणा का कहना है कि लोग प्रायः देखते जरूर हैं, लेकिन समयाभाव में सामान खरीदने से बचते हैं। इस कारण बिक्री प्रभावित होती है और व्यापारी घाटे में रहते हैं।
रेलवे से नहीं मिल रहा सहयोग
संचालकों को स्टॉल के रूप में खुले में लकड़ी के केबिन दिए जाते हैं। बरसात में यह केबिन गलने लगते हैं। मरम्मत की जिम्मेदारी भी स्वयं संचालकों पर डाल दी जाती है। रेलवे से कोई सहयोग नहीं मिलता। ऐसे में तीन माह के भीतर ही मरम्मत और नए निवेश पर खर्चा बढ़ जाता है।
व्यापारियों की मांग– दो वर्ष की हो आवंटन अवधि
व्यापारियों का कहना है कि यदि रेलवे वाकई इस योजना को सफल बनाना चाहता है तो तीन माह की बजाय कम से कम दो वर्ष की आवंटन अवधि तय करनी होगी। तभी व्यापारी कारोबार में निवेश करने और यात्रियों को आकर्षित करने की रणनीति बना पाएंगे। इधर, रेलवे अधिकारी राम स्वरुप का कहना है कि नीति में बदलाव उच्च स्तर पर होता है। जब तक मंत्रालय स्तर पर अवधि नहीं बढ़ाई जाती, तब तक योजना का ठोस लाभ यात्रियों और कारीगरों तक नहीं पहुंच पाएगा।
