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राजस्थान में कैंसर रोगियों की संख्या 27 फीसदी तक बढ़ी, राष्ट्रीय औसत से अधिक चिंताजनक

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राजस्थान में कैंसर रोगियों की संख्या 27 फीसदी तक बढ़ी, राष्ट्रीय औसत से अधिक चिंताजनक

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सुभाष शर्मा
उदयपुर, 3 फरवरी : राजस्थान में कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में तेजी से उभर रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य में कैंसर रोगियों की संख्या में करीब 27 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
उदयपुर के राजकीय रवींद्र नाथ टैगोर (आरएनटी) मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट इस बढ़ते खतरे की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। आरएनटी में हर साल साढ़े चार हजार से अधिक नए कैंसर रोगी सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार निजी अस्पतालों के आंकड़े जोड़ दिए जाएं, तो यह संख्या लगभग दोगुनी हो सकती है। वर्ष 2025 में आरएनटी में कुल 34 हजार से अधिक कैंसर मरीज उपचाराधीन रहे।
कैंसर रीजनल सेंटर की आवश्यकता
कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए आरएनटी प्रशासन ने उदयपुर में कैंसर रीजनल सेंटर खोलने का प्रस्ताव पिछले साल राज्य सरकार को भेजा है। इसे मंजूरी मिलती तो यह राज्य का दूसरा सबसे बड़ा रीजनल सेंटर होता, जहां पीपीपी मोड पर लीनियर एक्सीलेरेटर और पेट-सीटी मशीन लगाने की योजना थी।
सबसे ज्यादा रोगी मुंह, नाक, गला और फेफड़े के
रिपोर्ट के अनुसार आरएनटी में मुंह, नाक, गला और फेफड़े के कैंसर के सबसे अधिक मामले सामने आ रहे हैं। महिलाओं में स्तन और बच्चेदानी के कैंसर प्रमुख हैं। चिंता का विषय यह है कि अब 40 वर्ष से कम उम्र के युवा भी कैंसर की चपेट में आ रहे हैं। कैंसर विभागाध्यक्ष डॉ. नरेंद्र सिंह राठौड़ के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत मरीज गंभीर स्टेज में अस्पताल पहुंच रहे हैं, जिससे उपचार जटिल हो जाता है।
राजस्थान ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक
राष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। आईसीएमआर के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में देश में कैंसर मरीजों की संख्या करीब 12.3 लाख थी, जो 2025 तक यह संख्या 15.7 लाख तक पहुंच गई। राजस्थान में 2025 के लिए अनुमानित कैंसर इन्सीडेंस रेट 134.57 प्रति एक लाख आबादी बताया गया है, जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 113 प्रति एक लाख है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जीवनशैली में बदलाव, तंबाकू सेवन, प्रदूषण, बढ़ती उम्र और बेहतर जांच सुविधाओं के कारण मामलों की पहचान बढ़ रही है। ऐसे में जागरूकता, समय पर जांच और प्रारंभिक उपचार ही कैंसर से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार माना जा रहा है।

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