झील क्षेत्र में बढ़ता शोर बना चिंता का कारण
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पक्षी व्याकुल, मछलियाँ प्रभावित, विद्यार्थियों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर
उदयपुर, 22 फरवरी: झील क्षेत्र में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण और आतिशबाजी को लेकर आयोजित ‘झील संवाद’ में गंभीर चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि झीलों के आसपास स्थित आवासीय स्थलों और उद्यानों में सायंकाल तथा रात्रि के समय अत्यधिक ध्वनि में वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण और नागरिक जीवन प्रभावित हो रहा है।
झील विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि निर्धारित सीमा से अधिक ध्वनि से अनिद्रा, उच्च रक्तचाप और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं। परीक्षा काल में विद्यार्थियों की एकाग्रता, चिंतन शक्ति और स्मरण क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
झील विकास प्राधिकरण उदयपुर के पूर्व सदस्य तेजशंकर पालीवाल ने बताया कि तीव्र ध्वनि और कृत्रिम प्रकाश से पक्षियों के प्रवास, संचार और प्रजनन चक्र बाधित हो रहे हैं। पर्यावरणविदों ने चेताया कि आतिशबाजी से निकलने वाले सूक्ष्म कण जल में मिलकर जलीय जीवों के लिए विषाक्त स्थिति उत्पन्न करते हैं। वक्ताओं ने प्रशासन से प्रदूषण नियंत्रण नियमों का कठोर पालन सुनिश्चित करने की मांग की। पर्यावरणविद नंदकिशोर शर्मा ने चेताया कि पटाखों से निकले रसायन जलजीवों के लिए घातक हैं। शिक्षाविद कुशल रावल ने कहा कि शोध बताते हैं कि अधिक ध्वनि स्तर अध्ययन क्षमता तीस प्रतिशत तक कम हो जाती है। वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह ने भी विचार रखे।
