“मालवीय की वापसी से गर्माई वागड़ की सियासत: कांग्रेस को संजीवनी या भाजपा को फायदा?”

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सुभाष शर्मा
उदयपुर, 17 जनवरी
: वागड़ अंचल की राजनीति एक बार फिर बड़े मोड़ पर खड़ी है। दशकों से सत्ता और प्रभाव के केंद्र में रही यह आदिवासी बहुल पट्टी समय-समय पर राजनीतिक करवटें बदलती रही है। सत्तर के दशक तक वागड़ की राजनीति पर कांग्रेस के कद्दावर नेता हरिदेव जोशी और समाजवादी विचारधारा के मामा बालेश्वर दयाल का दबदबा रहा। दोनों दिग्गजों के निधन के बाद इस क्षेत्र में आदिवासी नेतृत्व के रूप में महेंद्रजीत सिंह मालवीय का उदय हुआ, जिन्होंने कांग्रेस के झंडे तले लंबा राजनीतिक सफर तय किया और खुद को एक अजेय नेता के रूप में स्थापित किया।
मालवीय ने बागीदौरा विधानसभा क्षेत्र से लगातार चुनाव जीतकर अपनी पकड़ मजबूत रखी। गत विधानसभा चुनाव में भी वे कांग्रेस से विधायक बने, लेकिन नेता प्रतिपक्ष नहीं चुने जाने से असंतुष्ट होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी। भाजपा में शामिल होने की कीमत उन्हें अपनी विधायकी गंवाकर चुकानी पड़ी। इसके बाद भाजपा ने लोकसभा चुनाव में उन्हें बांसवाड़ा-डूंगरपुर सीट से प्रत्याशी बनाया, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।
इस हार के पीछे दो प्रमुख कारण सामने आए। पहला, कांग्रेस ने इस सीट पर भारतीय आदिवासी पार्टी (बीएपी) के साथ तालमेल करते हुए अपना उम्मीदवार नहीं उतारा, जिससे कांग्रेस का पारंपरिक वोट बीएपी प्रत्याशी राजकुमार रोत को ट्रांसफर हो गया। दूसरा, भाजपा के कट्टर कार्यकर्ता मालवीय को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाए, जिसके चलते जमीनी स्तर पर समर्थन कमजोर रहा। परिणामस्वरूप, आसान मानी जा रही सीट भी हाथ से निकल गई।
हार के करीब दो वर्ष बाद मालवीय ने भाजपा से भी नाता तोड़ लिया। उनका कहना रहा कि भाजपा में उनका ‘दम घुटने लगा’ था। इसके बाद शुक्रवार को जयपुर में हुई कांग्रेस अनुशासन समिति की बैठक में अर्जुन बामनिया सहित अन्य नेताओं की वापसी पर चर्चा हुई, जिसमें महेंद्रजीत सिंह मालवीय की कांग्रेस में पुनः वापसी का फैसला लिया गया। इस घटनाक्रम के साथ ही वागड़ की राजनीति एक बार फिर नई दिशा में बढ़ती दिख रही है।
हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मालवीय की वापसी से भाजपा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा। वागड़ में अब भारतीय आदिवासी पार्टी ने भी मजबूत आधार बना लिया है। लोकसभा चुनाव और बागीदौरा उपचुनाव में बीएपी की जीत इसी का संकेत है, हालांकि इन चुनावों में कांग्रेस मैदान से बाहर रही थी। आगामी चुनावों में यदि कांग्रेस और बीएपी आमने-सामने होंगे तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है।
राजनीति से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार कांग्रेस की जीत की संभावनाएं तभी मजबूत होंगी जब महेंद्रजीत सिंह मालवीय और अर्जुन बामनिया एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरें। यदि दोनों नेताओं के बीच टकराव की स्थिति बनी रही, तो कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को फायदा होना तय माना जा रहा है।
हरिदेव जोशी और मामा बालेश्वर दयाल के बाद वागड़ में भाजपा की जड़ें मजबूत होने लगीं, जिसका श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी गतिविधियों को भी दिया जाता है। बांसवाड़ा अंचल के कई गांवों में खुले विद्या निकेतन स्कूल भाजपा के सामाजिक आधार का केंद्र बने। वहीं, बीते दो वर्षों में भारतीय आदिवासी पार्टी ने भी तेजी से जनाधार बढ़ाया है, जिससे अब वागड़ की राजनीति त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ती नजर आ रही है।