उदयपुर, 21 फरवरी: जिले के आदिवासी अंचलों में पारंपरिक खेती के साथ अब औषधीय फसलों की ओर रुझान तेजी से बढ़ रहा है। विशेषकर कोटड़ा क्षेत्र में अब तक मुख्य रूप से हल्दी की खेती की जाती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में किसान अश्वगंधा, सफेद मूसली, कालमेघ और अन्य औषधीय पौधों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
संयुक्त निदेशक कृषि—विस्तार सुधीर वर्मा ने बताया कि कम पानी में तैयार होने वाली औषधीय फसलें आदिवासी किसानों के लिए लाभकारी साबित हो रही हैं। इन फसलों की मांग आयुर्वेदिक दवाइयों और हर्बल उत्पादों के बढ़ते बाजार के कारण बढ़ी है। कई किसान समूहों को प्रशिक्षण देकर बीज और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। ऋषभदेव क्षेत्र के किसान नरेंद्र मीणा के अनुसार वह पथरीली जमीन पर साल में केवल एक ही खेती मक्का की ले पाते थे, लेकिन अब उन्होंने औषधीय पेड़ लगाना शुरू किया है। कृषि विभाग के प्रशिक्षण कार्यक्रम में वह और उनके भाई शामिल हुए और उन्होंने ग्वारपाठा सहित विभिन्न औषधीय पौधों की खेती करना शुरू कर दिया। उनका कहना है कि ग्वारपाठा तथा अन्य कई औषधीय पौधे ऐसे हैं, जिनकी उपज के लिए ज्यादा श्रम की जरूरत नहीं पड़ती। अच्छी बात तो यह है कि औषधीय खेती के उत्पाद की बिक्री के लिए उन्हें बाहर नहीं जाना पड़ता, बल्कि कई एजेंसी उनके पास आ जाती है और साल भर में पैदा फसल का सौदा पहले ही कर लेती है।
कोटड़ा में भी हल्दी की पारंपरिक खेती से जुड़े किसान अब फसल विविधीकरण अपना रहे हैं, जिससे जोखिम कम हो और आय में वृद्धि हो सके। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से औषधीय फसलों की प्रोसेसिंग और विपणन की भी पहल की जा रही है। किसान बाबूलाल के मुताबिक हल्दी के अलावा अन्य औषधीय पौधों की खेती से लाभ मिलने लगा है।