धर्म परिवर्तन कर भी मिले रहे एसटी लाभ पर संसद में सवाल

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सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने कानून मंत्री को लिखा पत्र, कहा– संवैधानिक स्पष्टता हो जरूरी
उदयपुर, 20 नवम्बर:
धर्म या सांस्कृतिक परिवर्तन के बाद भी अनुसूचित जनजाति (एसटी) की पात्रता का लाभ उठाने वाले लोगों पर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर मांग की है कि ऐसी परिस्थितियों में एसटी पात्रता की संवैधानिक वैधता को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए। सांसद का कहना है कि स्पष्टता के अभाव में कई लोग धर्म बदलने के बाद भी एसटी वर्ग की सुविधाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं।
डॉ. रावत ने बताया कि 1951 की पहली जनगणना में कई जनजातीय समूहों ने अपना धर्म ‘हिन्दू’ दर्ज कराया था, लेकिन बाद की जनगणनाओं में उन्होंने ‘ओआरपी (अन्य धर्म)’, ‘प्रोत्साहन’ या अन्य धर्म अंकित कर दिया। ऐसे मामलों में उनकी मूल सांस्कृतिक पहचान बदल गई, जबकि विशिष्ट संस्कृति एसटी पहचान के पाँच मानकों में से एक प्रमुख मानक है। इसके बावजूद इन लोगों को अब भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा और संवैधानिक लाभ प्रदान किए जा रहे हैं।
सांसद ने बताया कि ऐसे उदाहरण राजस्थान सहित कई राज्यों में सामने आए हैं। उनके लोकसभा क्षेत्र के ग्राम पई (गिर्वा), ग्राम कागदर (रिषभदेव) और अन्य स्थानों पर भी कई परिवारों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई है। देशभर में भी ऐसे कई मामले होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के ‘केरल राज्य बनाम चन्द्रमोहनन (1972)’ और गौहाटी हाईकोर्ट (28 मार्च 2006) के निर्णय भी मार्गदर्शक हैं।
डॉ. रावत ने मांग की है कि यदि 1951 की जनगणना में दर्ज धर्म से भिन्न धर्म बाद में अंकित किया जाता है, तो ऐसे व्यक्ति स्वतः एसटी श्रेणी से बाहर माने जाएं। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त के आंकड़े इस संवैधानिक स्पष्टता में मददगार साबित हो सकते हैं।