भर्तियां ठेका कंपनी को देने की तैयारी, मैनपावर सेवाओं के लिए समिति का गठन
उदयपुर, 8 फरवरी: मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में एक बार फिर करीब 300 एसएफएबी कर्मचारियों की नौकरी पर संकट आ गया है। सुविवि प्रशासन ने कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी का फरमान जारी कर दिया है। ठेका एजेंसी के माध्यम से अस्थायी भर्ती का जिस विश्वविद्यालय प्रशासन ने खुद विरोध किया था, अब वही प्रशासन उपरी दबाव के चलते एजेंसी के माध्यम से मैनपावर उपलब्ध कराने की टेंडर प्रक्रिया शुरू कर रहा है।
सुविवि में 25 सालों से सेवाएं दे रहे एसएफएबी कर्मचारी इस नए फैसले से गहरी चिंता में डूब गए हैं। उनका कहना है कि नई एजेंसी को लाकर पुराने अनुभवी कर्मचारियों को हटाने की तैयारी की जा रही है। एक साल पहले राज्य सरकार की ओर से जनवरी 2025 से दिसंबर 2025 तक एसएफएबी कर्मचारियों की सेवा जारी रखने का स्पष्ट आदेश दिया गया था। इसके बाद आगे के आदेश के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने राज्य सरकार से अनुरोध ही नहीं किया गया। इसके बजाय दो महीने का सेवा विस्तार देते हुए भर्ती परीक्षा की तर्ज पर एग्जाम करवा लिए गए। कर्मचारी इस परीक्षा के रिजल्ट के साथ ही स्थायी नौकरी की सौगात का इंतजार कर रहे थे कि तभी सुविवि प्रशासन ने सीधा ठेका प्रणाली अपनाने का रास्ता चुन लिया।
आरोप है कि ठेका और एजेंसी व्यवस्था लागू होने से कर्मचारियों का शोषण बढ़ेगा, पारदर्शिता खत्म होगी और विश्वविद्यालय में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। इसी बीच कुलपति की स्वीकृति से मैनपावर सेवाओं को लेकर एक समिति के गठन का आदेश सामने आते ही नई हलचल पैदा हो गई है और कर्मचारियों की ओर से नए सिरे से आंदोलन की रणनीति तैयार करने की सुगबुगाहट हो रही है। मैनपावर समिति में प्रो. सी.पी. जैन, प्रो. हनुमान प्रसाद, डॉ. अविनाश पंवार,डॉ. कल्पेश, डॉ. मुकेश बार्बर, डॉ. जी.एल. वसीट, उषा शर्मा, जे.के. भटनागर सदस्य के रूप में शामिल हैं तो दीपक वर्मा को कन्वीनर बनाया गया है।
जानकारों का कहना है कि अब कर्मचारियों पर उपर से सरकारी आदेश होने का बहाना बनाते हुए कई तरह के दबाव भी बनाए जा रहे हैं ताकि ठेका कंपनी के माध्यम से भर्ती की व्यवस्था की राह आसान की जा सके। ऐसे में विश्वविद्यालय में सवाल जोर पकड़ने लगा है कि जब सरकारी आदेश पहले से मौजूद है, तो प्रशासन नए ठेका मॉडल को क्यों थोपना चाहता है। कर्मचारियों का कहना है कि पूर्व वीसी प्रो. सुनीता मिश्रा के खिलाफ निर्णायक आंदोलन के समय स्थायीकरण ही मुख्य मुद्दा था। तब प्रशासनिक स्तर पर वही लोग कर्मचारियों के साथ खड़े थे जो आज विरोध में नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि कहीं पूर्व वीसी मिश्रा को हटाने के लिए तो उनके कंधों का इस्तेमाल नहीं किया गया। यदि ऐसा हुआ है तो फिर से कर्मचारी बड़ा आंदोलन करेंगे।