रद्दी की टोकरी में जल उपयोक्ता संगम का कानून

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23 साल बाद भी सिंचाई प्रबंधन में किसान हाशिये पर, नहरी तंत्र सौंपने की मंशा अधूरी
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 2 जनवरी:
राजस्थान में सिंचाई प्रबंधन में किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 में लागू किया गया सिंचाई प्रबंधन में कृषकों की सहभागिता अधिनियम और 2002 में बनाए गए उसके नियम, करीब 23 वर्ष बाद भी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाए हैं। जल उपयोक्ता संगम (वाटर यूजर एसोसिएशन) गठित होने के बावजूद न तो अधिकारों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट हस्तांतरण हुआ और न ही किसानों को नहरी तंत्र पर वास्तविक नियंत्रण मिल सका। इसका सीधा असर राजस्व वसूली, जल वितरण की समानता और सिंचाई व्यवस्था की दक्षता पर पड़ा है।
इस कानून को लागू करने के लिए सबसे पहले वर्ल्ड बैंक पोषित राजस्थान वाटर सेक्टर रिस्ट्रक्चरिंग प्रोजेक्ट (RWSRP) के तहत विभिन्न बांधों पर जल उपयोक्ता संगम गठित किए गए। योजना के अनुसार चयनित बांधों की नहरों की मरम्मत कर उन्हें संगमों को सौंपा जाना था। चुनाव कराए गए, विश्व बैंक के बजट से मरम्मत कार्य पूरे हुए, किसानों को प्रशिक्षण दिया गया और सिंचाई शुल्क वसूली के अधिकार भी दिए गए। इसके बावजूद नहरी तंत्र का वास्तविक हस्तांतरण नहीं हुआ और नियंत्रण व्यवहार में जल संसाधन विभाग के पास ही बना रहा, जिससे संगम केवल औपचारिक संस्था बनकर रह गए।
करोड़ों की योजनाएं, पर जमीनी अधिकार शून्य
जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (JBIC) के ऋण से 2010 से 2015 तक राजस्थान माइनर इरिगेशन इम्प्रूवमेंट प्रोग्राम चलाया गया। प्रत्येक जल उपयोक्ता संगम के लिए दो लाख रुपये का कॉर्पस फंड बनाया गया, ताकि ब्याज से संचालन खर्च पूरे हो सकें। वर्तमान में भी जापान बैंक के सहयोग से राजस्थान वाटर सेक्टर लाइवलीहुड इम्प्रूवमेंट प्रोग्राम चल रहा है और नए संगम गठित किए गए हैं, लेकिन अधिकारों का हस्तांतरण आज भी कागजों तक सीमित है।
संशोधन हुए, जागरूकता नहीं
वर्ष 2017 में अधिनियम में संशोधन कर महिला भागीदारी को अनिवार्य बनाया गया। खाताधारक किसान की पत्नी को मतदान का अधिकार और कार्यकारिणी में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई, लेकिन कई क्षेत्रों में इस संशोधन की जानकारी तक नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार विभाग अपनी जिम्मेदारी केवल चुनाव कराने तक सीमित मानता है। विभागीय वेबसाइट पर 2021 तक की ही प्रगति दर्ज होना भी प्रशासनिक उदासीनता का संकेत माना जा रहा है। दूसरी ओर, कई जल उपयोक्ता संगम भी पूरी जिम्मेदारी लेने के बजाय इसे सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच मान रहे हैं। माही परियोजना से सेवानिवृत्त सहायक अभियंता बी. पांचाल कहते हैं एक अच्छी योजना है, यदि इसे सही तरीके से लागू किया जाए तो किसानों और विभाग दोनों का भला होगा।
अधिकारियों के अलग—अलग दृष्टिकोण
जल उपयोक्ता संगमों को लेकर विभागीय अधिकारियों के बयान भी एकरूप नहीं हैं। जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता भुवन भास्कर का कहना है कि कानून का उद्देश्य किसानों को सशक्त बनाना है और संगमों को चरणबद्ध रूप से मजबूत किया जा रहा है। माही परियोजना के मुख्य अभियंता देवीसिंह बेनीवाल के अनुसार जहां संगम सक्रिय हैं, वहां जल वितरण और रखरखाव बेहतर हुआ है, जबकि समस्या वहां आती है जहां स्थानीय नेतृत्व कमजोर है।
उदयपुर के मुख्य अभियंता वीरेंद्र सिंह सागर ने महिला भागीदारी वाले संशोधन पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता स्वीकार की। वहीं इंदिरा गांधी नहर परियोजना के मुख्य अभियंता विवेक गोयल का मानना है कि यदि संगम वास्तविक जिम्मेदारी लें तो लागत घटेगी और जल उपयोग अधिक दक्ष होगा।