उदयपुर के आदिवासी बनाते हैं हर्बल गुलाल, ऑस्ट्रेलिया तक पहुंची मेवाड़ की खुशबू

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उदयपुर, 14 फरवरी (गोपाल लोहार): राजस्थान के उदयपुर जिले का आदिवासी अंचल अब अपनी पारंपरिक पहचान को रोजगार और आत्मनिर्भरता की नई दिशा में बदल रहा है। झाड़ोल, कोटड़ा, सलूंबर और गोगुंदा जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में महिलाएं और युवा पारंपरिक ज्ञान के आधार पर हर्बल गुलाल तैयार कर रहे हैं, जिसकी मांग अब देशभर में ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया और यूरोप तक पहुंच चुकी है।
फूलों और जड़ी-बूटियों से बनता है रंग
आदिवासी परिवार टेसू के फूल, हल्दी, गुलाब, चुकंदर, पालक, गेंदा और अन्य औषधीय वनस्पतियों से प्राकृतिक रंग तैयार करते हैं। यह गुलाल पूरी तरह रसायनमुक्त होता है, जिससे त्वचा और आंखों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता।
महिला समूह बना रहे हैं पहचान
झाड़ोल क्षेत्र के बाघपुरा, फलासिया, कोटड़ा के क्यारी, सरवाड़ा और सलूंबर के ग्रामीण इलाकों में स्वयं सहायता समूह होली से पहले बड़े स्तर पर गुलाल उत्पादन करते हैं। इन समूहों को प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने में उदयपुर की प्रमुख सामाजिक संस्था सेवा मंदिर की भी अहम भूमिका रही है।
राजीविका मिशन से मिला आर्थिक आधार
राजस्थान सरकार की योजना राजस्थान ग्रामीण आजीविका मिशन – राजीविका (Rajeevika) के तहत महिला स्वयं सहायता समूहों को मशीन, पैकिंग सामग्री और विपणन सहायता मिल रही है। इससे आदिवासी महिलाओं की आय में सीधा इजाफा हुआ है।
TRIFED और ट्राइबल बाजारों तक पहुंच
आदिवासी उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में TRIFED (Tribal Cooperative Marketing Development Federation) का सहयोग भी मिल रहा है। ट्राइफेड के “ट्राइब्स इंडिया” आउटलेट्स और मेलों में यह गुलाल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
वैल्यू एडिशन से बढ़ी कमाई
अब आदिवासी समूह केवल कच्चा माल नहीं बेचते, बल्कि गुलाल को आकर्षक पैकेट, इको-फ्रेंडली गिफ्ट बॉक्स, प्राकृतिक खुशबू मिश्रण और ऑर्गेनिक ब्रांडिंग
के साथ बाजार में उतार रहे हैं। इससे उत्पाद की कीमत कई गुना बढ़ गई है।
ऑस्ट्रेलिया तक हो रहा निर्यात
हर्बल और इको-फ्रेंडली रंगों की वैश्विक मांग के कारण उदयपुर के आदिवासी समूहों का गुलाल अब ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और खाड़ी देशों में बसे भारतीय समुदायों तक निर्यात हो रहा है।