होली के बीच खड़े डांडे को तलवार से काटने की परंपरा, गलती पर सलाखों के पीछे बंद करते
उदयपुर, 4 मार्च: उदयपुर में युवाओं की टोली हाथों में तलवार और बंदूकों को लेकर गांवों की गलियों से गुजरती है। इसके बाद होलिका दहन के दौरान धधकते कंडों पर दौड़ते है।
ये परम्परा उदयपुर जिले के नयागांव और खेरवाड़ा के पास आज भी निभाई गई। नयागांव उपखंड के बलीचा गांव में होलिका दहन पूर्णिमा के अगले दिन यानी धुलण्डी पर होता है। इस बार ग्रहण होने से आज बुधवार को यह आयोजन दोपहर में हुआ।
पहाड़ियों से उतरकर लोकदेवी के स्थानक पहुंचे
दहन के लिए सुबह से ही आस-पास और सीमावर्ती गुजरात के गांवों से आदिवासी समाज के लोग एकत्र होना शुरु हो गए थे। युवाओं की टोली हाथ में तलवार और बंदूक लेकर गांवों की गलियों से गुजरी। इसके बाद फाल्गुन के गीत गाते हुए पहाड़ियों से उतरकर लोकदेवी के स्थानक के पहुंची।
समाज के मुखिया, आस-पास के मोतबीर, महिलाएं-पुरुष, बच्चे सभी एकत्र हुए। ढोल की थाप पर गैर नृत्य भी हुआ। गैर डांडियों के बजाय तलवारों से खेला जाता है। कुछ युवा एक हाथ में तलवार और एक हाथ में बंदूक लेकर गैर नृत्य करते है।
गलती होने पर सलाखों के पीछे बंद करते
दोपहर करीब दो बजे शुरू हुए इस कार्यक्रम के दौरान धधकती होली के बीच खड़े डांडे को तलवार से काटना यहां की परम्परा है। पूर्व उपसरपंच धूलेश्वर वसोहर ने बताया कि इसके लिए युवा प्रयास करना शुरु कर देते हैं। ऐसा नहीं है कि हर कोई यह प्रयास कर ले, क्योंकि यहां ‘माइनस मार्किंग भी है।
यदि जीते तो पुरस्कार मिलता है और गलती होती तो मंदिर में सलाखों के पीछे बंद कर दिया जाता है। हालांकि, सजा लम्बी नहीं होती, लेकिन समाज के मुखियाओं की ओर से तय जुर्माना और भविष्य में गलती नहीं करने के वचन पर छोड़ते है।
निचला खेरवाड़ा में भी धधकते कंडों पर दौड़े युवा
उदयपुर जिले के खेरवाड़ा कस्बे के निचला खेरवाड़ा स्थित होली चौक में होलिका दहन के दौरान धधकते कंडों पर दौड़ते युवाओं को देखने क्षेत्रवासियों का हुजूम उमड पड़ा। मंगलवार रात करीब 1.30 होलिका दहन हुआ। इससे पूर्व होली चौक पर आस-पास गांवों के लोगों व स्थानीय लोगों का जुटना शुरू हो गया। आसपास गांव व स्थानीय लोगों के द्वारा लाए गए लगभग 1 दर्जन ढोल की थाप पर गैर नृत्य खेला गया। इसके बाद शुभ मुहूर्त में होलिका दहन हुआ। बड़ी होली के दहन के दौरान ग्रामीण युवा धधकते कंडो पर दौड़ने लगे। इस दौरान ग्रामीण युवाओं ने जलती होली के बीच खड़े प्रह्लाद रूपी लकड़ी को निकालकर नदी में विसर्जित किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। मान्यता है कि जलती होली में से प्रह्लाद रूपी लकड़ी को निकालकर विसर्जन करने से क्षेत्र में शांति, खुशहाली बनी रहती है।