पति की हत्या मामला: पत्नी और प्रेमी 27 साल बाद बरी
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दिसम्बर 2001 में प्रतापगढ़ कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
उदयपुर, 23 अक्टूबर: राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने 27 साल पुराने हत्या के मामले में पत्नी संपत बाई और उसके कथित प्रेमी जगदीश को बरी कर दिया। जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने प्रतापगढ़ फास्ट ट्रैक कोर्ट के 5 दिसंबर 2001 के फैसले को पलट दिया। तब प्रतापगढ़ की कोर्ट ने दोनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन पक्ष सबूतों की श्रृंखला पूरी करने में विफल रहा और आवश्यक मानदंडों के बिना दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।
मामला 3 मार्च 1998 का है, जब चित्तौड़गढ़ के गाडोला गांव निवासी अंबालाल की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई। आरोप था कि पत्नी संपत बाई और जगदीश ने अंबालाल की चाय में जहर मिलाकर हत्या की।
हाईकोर्ट ने 12 गवाहों की गहन जांच की। इसमें धापू बाई ने जगदीश और संपत बाई के बीच किसी अवैध संबंध से इनकार किया। बद्रीलाल ने पहले कहा कि उन्हें मौत का कारण पता नहीं, लेकिन बाद में आरोप लगाया कि चाय में जहर मिला था। अन्य गवाह फकरू और रामलाल ने भी विरोधाभासी बयान दिए।
जहर देने के चार आवश्यक तत्व नहीं सिद्ध
हाईकोर्ट ने जहर से हत्या के मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय चार शर्तें लागू कीं: जिनमें आरोपी का स्पष्ट मकसद होना। मृतक की मौत जहर से हुई हो। आरोपी के पास जहर मौजूद होना और आरोपी को जहर देने का अवसर मिला होना शामिल है। इस मामले में अभियोजन पक्ष इन किसी भी शर्त को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। न मकसद, न जहर का प्रमाण, न अवसर और न ही मृतक की मौत का निश्चित कारण सिद्ध हुआ।
पंचशील सिद्धांत के तहत बरी
हाईकोर्ट ने पंचशील सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोष सिद्ध करने के लिए सभी तथ्य स्पष्ट, निर्णायक और अप्रतिबंधित होने चाहिए। चूंकि अभियोजन इन मानकों को पूरा नहीं कर पाया, दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया। जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि संपत बाई के पास कोई जहरीला पदार्थ नहीं मिला और पोस्टमार्टम में मृत्यु का निश्चित कारण नहीं बताया गया। ऐसे में 27 साल पुराने इस मामले में दोनों आरोपी मुक्त हो गए।
