उत्पादन बढ़ाने की होड़ में बिगड़ा फल-सब्जियों का स्वाद: डॉ. प्रताप सिंह
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हाईब्रिड खेती, केमिकल उपयोग और मिट्टी की घटती उर्वरकता बनी बड़ी वजह
उदयपुर, 5 फरवरी (राजेश वर्मा): देश की बढ़ती आबादी की मांग पूरी करने और अधिक उत्पादन के दबाव में फल-सब्जियों के स्वाद में लगातार गिरावट आ रही है। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. प्रताप सिंह ने कहा कि उत्पादन बढ़ाने और मुनाफा कमाने की दौड़ में जब अनचाही चीजों का उपयोग होने लगा तो खाद्य सामग्री का प्राकृतिक स्वाद बिगड़ गया।
पंजाब केसरी से बातचीत में डॉ. सिंह ने कहा कि हाईब्रिड फल-सब्जियों पर जोर देने के साथ कम समय में ज्यादा पैदावार लेने की कोशिशों ने स्वाद को प्रभावित किया है। आज अधिक उत्पादन के लिए केमिकल, दवाओं और कृत्रिम तकनीकों का बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। इससे आकार और मात्रा तो बढ़ गई, लेकिन पुराने समय जैसा स्वाद अब नहीं रहा।
मिट्टी की उर्वरकता में कमी भी जिम्मेदार
डॉ. प्रताप सिंह ने बताया कि पहले खेती में बैलों और मवेशियों का उपयोग होता था, जिससे खेतों को देसी खाद सहज रूप से मिलती थी। अब मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल और मवेशियों की कमी के कारण खेतों में प्राकृतिक खाद का प्रयोग घट गया है। इससे मिट्टी की उर्वरकता कमजोर हुई और उत्पादन की गुणवत्ता प्रभावित हुई।
जैविक और प्राकृतिक खेती ही समाधान
उन्होंने कहा कि स्वाद लौटाने का एक उपाय जैविक उत्पादों को बढ़ावा देना है, लेकिन यह तभी संभव है जब देसी खाद, स्वच्छ सिंचाई जल और रसायन-मुक्त खेती अपनाई जाए। वर्तमान में कई स्थानों पर प्रदूषित पानी से सिंचाई हो रही है, जिससे जैविक खेती भी चुनौती बन गई है।
किचन गार्डन की बढ़ती पहल
डॉ. सिंह ने बताया कि इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए प्राकृतिक खेती पर फिर से ध्यान दिया जा रहा है। लोग अब घरों के आंगन में सब्जियां उगाने लगे हैं और किचन गार्डन विकसित कर रहे हैं। उन्होंने अपील की कि स्वादिष्ट और स्वस्थ फल-सब्जियों के लिए समाज को प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा।
