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कम पढ़ाई—बड़ा कमाल, किसान रामलाल ने उगाई अमेरिकन केसर

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कम पढ़ाई—बड़ा कमाल, किसान रामलाल ने उगाई अमेरिकन केसर

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अश्वगंधा की जड़ से भी लाखों की उम्मीद, गर्म इलाकों में नई संभावनाएं
उदयपुर, 27 फरवरी (सुभाष शर्मा):
रेगिस्तानी प्रदेश राजस्थान में केसर की खेती सुनने में भले चौंकाने वाली लगे, लेकिन राजसमंद जिले के आमेट उपखंड के झोर गांव निवासी किसान रामलाल खारोल ने कम पढ़ाई के बावजूद बड़ा कमाल कर दिखाया है। हालांकि यह कश्मीर वाला केसर नहीं, बल्कि अमेरिकन केसर (अड़क/कुसुम) है, जिसका उपयोग फूड आइटम में नेचुरल कलरिंग के रूप में होता है।
परंपरागत गेहूं-मक्का की खेती छोड़ रामलाल ने औषधीय फसल अश्वगंधा के साथ अमेरिकन केसर की बुवाई की। कम पानी और गर्म जलवायु में पनपने वाली इन फसलों ने राजस्थान की जलवायु में बेहतर परिणाम दिए। छिड़काव विधि से बुवाई, सीमित सिंचाई (पहली, पांच दिन बाद दूसरी, 12 दिन बाद तीसरी और 45 दिन बाद चौथी) तथा गोबर खाद के उपयोग से 120 दिन में फसल तैयार हो गई।


महज पांचवीं पास किसान रामलाल ने औषधीय महत्व की अश्वगंधा की खेती भी की है। अश्वगंधा की जड़, तना और पत्तियां आयुर्वेदिक दवाइयों के उपयोग में आती हैं और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी खासी मांग है। किसान ने अश्वगंधा के बीज पर करीब 20 हजार रुपए खर्च किए और इस सीजन में 10 लाख रुपए तक आय का अनुमान है। सेवानिवृत्त कृषि विज्ञानी डॉ. सुबोध शर्मा बताते हैं कि कम पानी, उच्च तापमान और काली-पीली मिट्टी वाले क्षेत्रों में अमेरिकन केसर व अश्वगंधा की अपार संभावनाएं हैं, जिससे सूखे प्रभावित इलाकों में भी नकदी फसल का विकल्प तैयार हो सकता है।

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