एंडेमिक स्पीशीज का न हो जाए THE END..!
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अरावली की नई परिभाषा पर जीव-पादप शास्त्री भी चिंता में
कौशल मूंदड़ा
उदयपुर, 24 दिसम्बर : राजस्थान के अरावली क्षेत्र में 41 जन्तु और 49 वनस्पति पादप स्थानिक प्रजातियां (एंडेमिक) विलुप्त होने की कगार पर हैं। अब हाल ही सामने आए नए प्रावधानों के चलते पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि लगभग ये सभी प्रजातियां 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ों पर ही पनपती रही हैं, यदि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ों पर लगातार खनन व खनन की आड़ में अन्य गतिविधियों को हरी झंडी मिलती रही तो इन प्रजातियों का ‘THE END’ हो जाएगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार राजस्थान में स्थानिक (एंडेमिक) प्रजातियों में 41 जन्तु प्रजातियां हैं। इनमें स्पंज की 01 प्रजाति, चपटे कृमि (ट्रिमेटोड) की 04, परुषकवची (क्रस्टेशियन) की 07, दीमक की 06, भृंग (बीटल) की 02, बिच्छू की 09, द्विपंखी कीट (डिप्टेरा) की 01, अर्द्धपंखी (हेमिप्टेरा) की 02, रस चूषक कीट (कोक्सिड) की 02, मछलियों की 04, छिपकली की 01 तथा पक्षियों की 02 प्रजातियां शामिल हैं।
इसी तरह, कुल 49 तरह की पादप प्रजातियां राजस्थान के अरावली क्षेत्र में ही पनपती हैं। इनमें बैक्टीरिया की 01, लाइकेन की 01, शैवाल की 02, ब्रायोफाइट की 03, फर्न की 10, द्विबीजपत्री शाक, लता, झाड़ी, वृक्ष की 26 तथा एकबीजपत्री (घास) की 06 प्रजातियां शामिल हैं।
कहते हैं पर्यावरणविद
-पर्यावरणविद तथा सेवानिवृत्त वन अधिकारी डॉ. सतीश शर्मा कहते हैं अरावली पर्वतमाला अपनी गोद में कई अचम्भे समेटे हुए है। राजस्थान में ही नहीं, अन्य राज्यों में फैली अरावली पर्वतमाला में भी कई ऐसे जीव-जन्तु-पादप हैं जो सिर्फ अरावली पर्वतमाला में हैं और अब लुप्त प्राय: की श्रेणी में हैं। इनके पनपने के लिए अरावली की गोद ही मुफीद है। विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति ने जो हमें अरावली पर्वतमाला और अरावली के पारिस्थितिक तंत्र का तोहफा दिया है, उसे बचाते हुए आगे बढ़ना भी हमारी ही जिम्मेदारी है। यदि अरावली पर्वतमाला डिस्टर्ब होती है तो सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र भी डिस्टर्ब होगा जिसकी चपेट में आने से जीव-जंतु-पादप भी नहीं बच सकेंगे।
