नई ‘क्लोन नीलगिरी’ किस्म: अब सफेदा से बढ़ेगी किसानों की कमाई, भूजल पर नहीं पड़ेगा असर
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3 साल में तैयार होगी फसल, जड़ें सिर्फ 3 फीट तक—पहाड़ी खेतों में भी संभव खेती
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 13 फरवरी: नीलगिरी (सफेदा) को लेकर वर्षों से किसानों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रहा है कि यह पेड़ भूजल स्तर को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन अब इस धारणा को बदलने वाली एक नई वैज्ञानिक किस्म सामने आई है। टिश्यू कल्चर तकनीक से तैयार की गई क्लोन नीलगिरी की यह नई किस्म न केवल किसानों की आमदनी बढ़ाएगी, बल्कि इसकी जड़ें अधिकतम तीन फीट तक सीमित रहने से भूजल पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
पहले बीज से तैयार सफेदा के पेड़ को विकसित होने में करीब 10 साल लग जाते थे और इसकी जड़ें गहराई तक फैलकर भूजल पर प्रभाव डालती थीं। लेकिन अब क्लोन किस्म का पेड़ महज तीन से साढ़े तीन साल में कटाई योग्य हो जाएगा। इसकी बढ़त सीधी ऊपर की ओर होती है, जिससे खेत में दूसरी फसल लेना भी संभव रहेगा।
नई किस्म को उदयपुर संभाग के पहाड़ी क्षेत्रों में भी लगाया जा सकता है। इसे सीमित सिंचाई की जरूरत होगी, जिसे किसान ड्रिप तकनीक या सामान्य सिंचाई से पूरा कर सकते हैं। खेत की मेड़ या बाड़ के रूप में भी यह फसल उपयोगी साबित होगी।

कंपनियां खुद करेंगी खरीद, किसानों को बाजार की चिंता नहीं
ग्रीन प्लाई स्पेशलिटी पैनल्स प्राइवेट लिमिटेड के सीनियर एक्जीक्यूटिव अजय शर्मा के अनुसार उनकी कंपनी को रोजाना 50 से 60 टन लकड़ी की आवश्यकता होती है। सफेदा की लकड़ी से प्लाई, कागज और अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं, इसलिए किसानों को बिक्री और दाम को लेकर परेशानी नहीं होती।
हर तीसरे साल कमाई, मेवाड़-वागड़ में बढ़ी रुचि
हाल ही उदयपुर में आयोजित प्रदेश स्तरीय किसान सम्मेलन में शामिल कृषि विशेषज्ञों ने बताया कि यदि एक एकड़ में क्लोन नीलगिरी लगाते हैं तो तीसरे साल तक 3 से 3.5 लाख रुपए की आय प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही एक बार सफेदा लगाने के बाद लगातार पांच बार उसका उत्पाद लिया जा सकेगा। जिसको लेकर किसान को अलग से खर्चा नहीं करना पड़ेगा। हाल ही घाटोल के पूर्व विधायक मानजी भाई ने अपने खेतों में 10 हजार से अधिक पौधे लगवाए हैं। मेवाड़-वागड़ क्षेत्र के किसान भी अब इसे तेजी से अपनाने लगे हैं।
