पारिस्थितिकी सुरक्षित होगी तभी टिकाऊ कृषि विकास संभव: प्रो. शर्मा
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कीट-परागणकर्ताओं की घटती संख्या से फसलों की उपज पर सीधा असर, रसायनिक कृषि से बिगड़ रहा संतुलन
राजेश वर्मा
उदयपुर, 24 दिसम्बर: यूनेस्को द्वारा संचालित महात्मा गांधी शान्ति एवं विकास संस्थान के अध्यक्ष तथा गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के पूर्व कुलपति प्रो. भगवती प्रसाद शर्मा ने चेतावनी दी है कि देश में कृषि विकास के सभी प्रयास तभी सफल हो सकते हैं, जब पारिस्थितिकी तंत्र (इकोलॉजी) को समानांतर रूप से संरक्षित किया जाए। उन्होंने कहा कि कीट-पतंगों और परागणकर्ताओं की तेजी से घटती संख्या का सीधा असर कृषि उत्पादकता पर पड़ रहा है, जो भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत है।
फसल उत्पादकता में 15–18% योगदान परागणकर्ताओं का
उदयपुर प्रवास के दौरान बातचीत में प्रो. शर्मा ने बताया कि मधुमक्खी, तितली, भृंग, भमर, मौथ और बीटल जैसे कीट-परागणकर्ता फसलों की 15 से 18 प्रतिशत तक उत्पादकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। विश्व में पाए जाने वाले तीन लाख से अधिक पुष्पित (एंजियोस्पर्म) पौधों और उनसे जुड़े डेढ़ लाख से अधिक कीट प्रजातियों के बीच सहजीवी संबंध है। कई बागवानी फसलों की आधी से अधिक उपज इन्हीं कीटों पर निर्भर है। बादाम जैसे कई वृक्ष तो पूरी तरह कीट-परागित हैं।
घटती हरितिमा और रसायनिक कृषि से संकट गहराया
प्रो. शर्मा ने चिंता जताई कि देश में घटती हरितिमा, जैव विविधता का तेजी से विलोपन, सीमित प्रजातियों का पौधरोपण और कीटनाशी रसायनों का अत्यधिक उपयोग पारिस्थितिकी संतुलन को नष्ट कर रहा है। उन्होंने बताया कि कई परागणकर्ता कीट आधा किलोमीटर से अधिक दूरी तय नहीं कर पाते, ऐसे में एक ही या सीमित प्रजातियों के पौधे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने में सक्षम नहीं हैं।
नियोनिकोटिनोइड कीटनाशक मधुमक्खियों के लिए घातक
उन्होंने कहा कि देश में नियोनिकोटिनोइड श्रेणी के कीटनाशकों के विवेकहीन उपयोग से मधुमक्खियों की स्मृति प्रभावित होती है, जिससे वे पराग संग्रह के बाद अपने छत्तों तक वापस नहीं लौट पातीं। फसलों के पुष्पीकरण के बाद भी इन रसायनों का छिड़काव कीट-परागणकर्ताओं के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है।
केंचुए और सूक्ष्मजीव नष्ट होने से मिट्टी बीमार
प्रो. शर्मा ने बताया कि कृषि रसायनों के अति प्रयोग से केंचुए, मित्र कीट और सूक्ष्मजीव नष्ट हो रहे हैं, जिससे मृदा की उर्वरता और जलग्रहण क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है। एक हेक्टेयर भूमि में केंचुए वर्षभर में 6 लाख से अधिक सूक्ष्म छिद्र बनाते थे, जिससे पानी भूगर्भ तक पहुंचता था। इनके विलोपन से देश के आधे से अधिक जिले डार्क जोन में बदलते जा रहे हैं।
एनपीके असंतुलन से भूमि ऊसर बन रही
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक रूप से उर्वरकों का संतुलित अनुपात नाइट्रोजन:फॉस्फोरस:पोटाश = 4:2:1 होना चाहिए, लेकिन भारत में असंतुलित एनपीके उपयोग के कारण बड़ी मात्रा में भूमि ऊसर और अनउर्वर होती जा रही है।
कृषि को लाभदायक बनाने के लिए मूल्य संवर्द्धन जरूरी
प्रो. शर्मा ने कहा कि किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि को खाद्य प्रसंस्करण और मूल्य संवर्द्धन से जोड़ना अनिवार्य है। गेहूं या चावल की कच्ची बिक्री के बजाय आटा, सूजी, मैदा, केक-पेस्ट्री जैसे उत्पादों से ही कृषि लाभकारी बन सकती है।
भारत 40 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है
उन्होंने बताया कि भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी 90 करोड़ कार्यशील आयु की आबादी है। भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अनुसार यदि यह जनसंख्या पूर्ण रूप से रोजगार से जुड़ जाए, तो भारत 40 ट्रिलियन डॉलर (400 खरब डॉलर) की अर्थव्यवस्था बन सकता है।
