मरीज बाहर से स्वस्थ, अंदर पत्थर बन रहे फेफड़े
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उदयपुर के पीएमसीएच में सामने आया दुर्लभ बीमारी का अनोखा मामला
दुनियाभर में 1000 केसेज आए है सामने
उदयपुर, 3 फरवरी: चिकित्सा विज्ञान में कभी-कभी ऐसे मामले सामने आते हैं, जो लक्षणों और जांच रिपोर्टों के बीच बने सामान्य तालमेल को पूरी तरह तोड़ देते हैं। उदयपुर के पेसिफिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) में ऐसा ही एक अत्यंत दुर्लभ मामला सामने आया है, जहां 34 वर्षीय महिला में पल्मोनरी एल्वियोलर माइक्रोलिथियासिस (PAM) नामक फेफड़ों की बीमारी की पुष्टि हुई है। यह बीमारी दुनिया में बेहद कम पाई जाती है और भारत में इसके मामले गिने-चुने हैं।
पेशे से किसान महिला को केवल सांस लेने में हल्की तकलीफ थी। न खांसी, न बुखार और न ही सीने में दर्द की शिकायत थी। जांच के दौरान ऑक्सीजन लेवल 98 प्रतिशत रहा और फेफड़े सामान्य रूप से कार्य करते प्रतीत हो रहे थे। लेकिन जब चेस्ट एक्स-रे किया गया तो दोनों फेफड़ों में रेत के कणों जैसी असंख्य गांठें दिखाई दीं, जिसे मेडिकल भाषा में सैंडस्टॉर्म अपीयरेंस कहा जाता है।
एचआरसीटी में हुआ खुलासा
चेस्ट एवं टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ. आमिर शौकत के अनुसार एचआरसीटी स्कैन में फेफड़ों के भीतर कैल्शियम फॉस्फेट के सूक्ष्म पत्थर जमा पाए गए, जिससे फेफड़े धीरे-धीरे सख्त हो जाते हैं। यह स्थिति PAM बीमारी की स्पष्ट पहचान है।
क्यों होती है यह बीमारी
डॉ. आमिर शौकत ने बताया कि PAM एक आनुवंशिक बीमारी है, जो SLC34A2 जीन में म्यूटेशन के कारण होती है। यह बीमारी बेहद धीमी गति से बढ़ती है, इसलिए मरीज वर्षों तक बिना गंभीर लक्षणों के सामान्य जीवन जीता रहता है।
इलाज की चुनौती
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसका इलाज है। फिलहाल ऐसी कोई दवा उपलब्ध नहीं है जो फेफड़ों में जमे माइक्रोलिथ्स को घोल सके। अंतिम अवस्था में लंग ट्रांसप्लांट ही एकमात्र प्रभावी विकल्प माना जाता है। अभी मरीज की स्थिति स्थिर होने के कारण डॉक्टरों ने वेट एंड वॉच नीति अपनाई है।
गलत इलाज से बचाव बना मिसाल
भारत में ऐसे मामलों को अक्सर टीबी या सिलिकोसिस मानकर इलाज शुरू कर दिया जाता है, लेकिन पीएमसीएच के चिकित्सकों की सूझबूझ से मरीज को अनावश्यक दवाइयों से बचाया गया। चूंकि यह बीमारी अनुवांशिक है, इसलिए परिवार के अन्य सदस्यों की स्क्रीनिंग भी कराई जा रही है। इस सफल निदान में डॉ. आमिर शौकत के साथ डॉ. अतुल लुहाडिया, डॉ. निश्चय, डॉ. अरविंद, डॉ. ड्यू, तकनीशियन लोकेन्द्र, दीपक और नर्सिंग स्टाफ राम प्रसाद का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
