नदी को नाला बना दिया, उदयपुर में होगा बड़ा आंदोलन
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12 गांवों से ढोल लाकर बजाए जाएंगे, ढोल-शंखनाद के साथ होगा ऐतिहासिक जनआंदोलन, फैक्ट्रियों और गंदगी के खिलाफ आर-पार की लड़ाई
उदयपुर, 15 फरवरी: उदयपुर की जीवनरेखा मानी जाने वाली आयड़ नदी आज फैक्ट्रियों के जहरीले केमिकल और शहर के सीवेज के कारण एक प्रदूषित नाले में तब्दील होती जा रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि नदी किनारे बसे गांवों में बीमारियां बढ़ रही हैं और भूजल तक दूषित हो रहा है। अब झील प्रेमियों और किसानों ने आयड़ नदी को बचाने के लिए बड़ा जनआंदोलन छेड़ने का निर्णय लिया है।
पिछोला किनारे बनी आंदोलन की रणनीति
आयोजन की रूपरेखा तय करने के लिए पिछोला झील किनारे भीमाशंकर महादेव मंदिर परिसर में अहम बैठक हुई। इसमें मेवाड़ किसान संघर्ष समिति और झील प्रेमियों ने हिस्सा लिया। बैठक की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि अब चुप रहने का समय खत्म हो गया है, क्योंकि प्रदूषण लोगों की जान पर बन आया है।
12 गांवों के ढोल और साधु-संतों का शंखनाद
पूर्व उपसरपंच मदनलाल डांगी ने बताया कि 25 फरवरी को आयड़ नदी के किनारे बसे 12 गांवों से एक-एक ढोल लाया जाएगा। कानपुर खेड़ा पुलिया पर जब ये ढोल एक साथ गूंजेंगे तो प्रशासन को जगाने का संदेश देंगे। इस दौरान साधु-संत शंखनाद कर आंदोलन का शुभारंभ करेंगे।
फैक्ट्रियों को हटाने और एसटीपी अनिवार्य करने की मांग
डॉ. मेहता ने मांग की कि कलड़वास रीको और मादड़ी क्षेत्र की केमिकल फैक्ट्रियों को तत्काल अन्यत्र शिफ्ट किया जाए। नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि हर होटल-रिसोर्ट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) अनिवार्य हो, ताकि गंदा पानी नदी में न जाए।
बीमारियों का घर बन रही आयड़
संयोजक विष्णु पटेल ने बताया कि प्रदूषण का असर गांवों में स्वास्थ्य संकट बन चुका है। उन्होंने अपील की कि यह आंदोलन राजनीति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई है। 25 फरवरी को किसान, युवा और शहरवासी बड़ी संख्या में जुटेंगे।
