देवस्थान विभाग के अधीन होगा सांवरिया सेठ का प्राकट्य स्थल मंदिर
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ट्रस्ट की वीवीआईपी बैठक पर उठे सवाल, गोपनीयता, पास सिस्टम और मीडिया प्रतिबंध के बीच दो सत्रों में हुई बैठक
चित्तौड़गढ़, 27 जनवरी: प्रसिद्ध कृष्ण धाम श्री सांवरिया सेठ के प्राकट्य स्थल बागुंड पर संचालित ट्रस्ट की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में आ गई है। मंगलवार को आयोजित ट्रस्ट की आवश्यक बैठक को जिस तरह अत्यधिक गोपनीय और वीवीआईपी स्वरूप दिया गया, उसने पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए। हालांकि, इसी बैठक में वर्षों से आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग—ट्रस्ट को देवस्थान विभाग के अधीन संचालित करने—पर आम सहमति बनना एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक फैसला माना जा रहा है।
श्री सांवरिया सेठ प्राकट्य स्थल बागुंड पर संचालित ट्रस्ट की मंगलवार को दो सत्रों में बैठक आयोजित की गई। बैठक का एजेंडा न तो पहले सार्वजनिक किया गया और न ही सदस्यों को पूर्व सूचना दी गई। ट्रस्ट की ओर से 17 जनवरी को जारी सूचना में स्पष्ट किया गया था कि बैठक में प्रवेश केवल प्रवेश-पत्र के आधार पर ही दिया जाएगा, जो आमतौर पर सरकारी निकायों की बैठकों में भी देखने को नहीं मिलता।
मीडिया और जनप्रतिनिधियों पर पाबंदी
बैठक के दौरान मीडिया, क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और अधिवक्ताओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध रहा। केवल पासधारी सदस्यों को ही परिसर में जाने की अनुमति दी गई। मौके पर शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए भदेसर वृत्ताधिकारी विनोद कुमार, भादसौड़ा थानाधिकारी महेंद्र सिंह पुलिस जाप्ते के साथ मौजूद रहे।
देवस्थान विभाग के अधीन जाने पर सहमति
सुबह सत्र में ट्रस्ट सदस्यों ने सर्वसम्मति से ट्रस्ट को देवस्थान विभाग के अधीन संचालित करने पर सहमति जताई। इसके बाद दोपहर सत्र में इस संबंध में आवश्यक प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया गया, जिसे शीघ्र ही जिला कलेक्टर को भेजने का निर्णय लिया गया। यह फैसला आसपास के छह गांवों के ग्रामीणों के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
पदाधिकारियों के रवैये पर नाराजगी
बैठक के दौरान ट्रस्ट अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारियों का रवैया बेहद रूखा नजर आया। जानकारी लेने पहुंचे ग्राम पंचायत प्रशासक, सामाजिक संगठनों, अधिवक्ताओं और मीडियाकर्मियों को यह कहकर टाल दिया गया कि “बाकी बातों से आपका कोई लेना-देना नहीं है।”
पूर्व में भी हो चुका है विरोध
ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीण पहले भी कई बार विरोध जता चुके हैं। सितंबर में पांच दिन का अनिश्चितकालीन धरना, सोसायटी एक्ट के उल्लंघन और चुनाव न कराने के आरोप लगातार उठते रहे हैं। ऐसे में देवस्थान विभाग के अधीन संचालन का निर्णय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
