कोकापुर में अंगारों पर आस्था की चाल, भीलूड़ा में पत्थरमार होली की परंपरा
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वागड़ अंचल में सदियों पुरानी परंपराएं आज भी जीवित, खून की बूंद को मानते हैं शगुन
उदयपुर, 1 मार्च: वागड़ अंचल में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और साहस का अनूठा संगम है। आदिवासी बहुल डूंगरपुर जिले के कोकापुर और भीलूड़ा गांवों में सदियों से निभाई जा रही परंपराएं इस पर्व को विशेष पहचान देती हैं।
दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलने की परंपरा
कोकापुर गांव में होलिका दहन के दूसरे दिन अलसुबह ग्रामीण जलती होली के दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं। सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में यह आयोजन होता है। मान्यता है कि अंगारों पर चलने से गांव पर किसी प्रकार की विपदा नहीं आती और पूरे वर्ष स्वास्थ्य व समृद्धि बनी रहती है। इस अद्भुत परंपरा को देखने आसपास के क्षेत्रों से हजारों लोग पहुंचते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि वर्षों से निभाई जा रही इस परंपरा में अब तक कोई बड़ी अनहोनी नहीं हुई।
भीलूड़ा में ‘पत्थरों की राड़’
वहीं भीलूड़ा गांव में धुलंडी पर करीब 200 साल पुरानी पत्थरमार होली खेली जाती है, जिसे स्थानीय बोली में ‘पत्थरों की राड़’ कहा जाता है। यहां रंगों की जगह पत्थर बरसाए जाते हैं और खून की बूंद गिरना शुभ संकेत माना जाता है।
रघुनाथ मंदिर परिसर में आसपास के गांवों से आए करीब 400 प्रतिभागी दो टोलियों में बंट जाते हैं। हाथों में पत्थर, गोफन और ढाल लिए ये लोग एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। दर्शक सुरक्षित ऊंचे स्थानों से इस रोमांचक दृश्य को देखते हैं। चोट लगने और खून बहने पर भी प्रतिभागी पीछे नहीं हटते, बल्कि इसे आगामी वर्ष के लिए शुभ मानते हैं। गंभीर घायलों के उपचार के लिए नजदीकी अस्पताल में चिकित्सकों की विशेष टीम तैनात रहती है।
