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सरकारी अस्पतालों की सेहत पर दो मॉडल आमने-सामने

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सरकारी अस्पतालों की सेहत पर दो मॉडल आमने-सामने

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निजीकरण बनाम प्रीमियम सुविधा: नीति आयोग और आरएनटी मेडिकल कॉलेज की अलग सोच
सुभाष शर्मा
उदयपुर, 9 जनवरी:
देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक तरफ केंद्र सरकार 750 बिस्तरों से अधिक क्षमता वाले सरकारी अस्पतालों को पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत निजी क्षेत्र को सौंपने की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर उदयपुर स्थित आरएनटी मेडिकल कॉलेज ने राज्य सरकार को एक ऐसा वैकल्पिक प्रस्ताव भेजा है, जो सरकारी अस्पतालों के ढांचे में रहते हुए मरीजों को प्रीमियम सुविधाएं उपलब्ध कराने पर आधारित है। दोनों ही प्रस्ताव स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने के उद्देश्य से जुड़े हैं, लेकिन उनके रास्ते और प्रभाव अलग-अलग हैं।
नीति आयोग का मॉडल: आधे बेड सशुल्क, आधे नि:शुल्क
नीति आयोग के प्रस्तावित मॉडल के अनुसार प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर के वे सभी सरकारी अस्पताल जिनमें 750 से अधिक बिस्तर हैं, उन्हें PPP मॉडल के तहत निजी क्षेत्र के साथ मिलकर संचालित किया जाएगा। इस व्यवस्था में अस्पतालों के लगभग 50 प्रतिशत बिस्तर निजी अस्पतालों की तरह सशुल्क होंगे, जबकि शेष 50 प्रतिशत बिस्तरों पर भर्ती मरीजों का इलाज पूरी तरह नि:शुल्क किया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे आधुनिक संसाधन, बेहतर प्रबंधन और अतिरिक्त वित्तीय सहयोग मिलेगा, लेकिन आशंका यह भी है कि निजी भागीदारी बढ़ने से आम मरीजों की प्राथमिकता प्रभावित हो सकती है।
आरएनटी का प्रस्ताव: इलाज मुफ्त, सुविधा के लिए शुल्क
इसके विपरीत आरएनटी मेडिकल कॉलेज का प्रस्ताव पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहकर तैयार किया गया है। इसमें भर्ती सभी मरीजों का उपचार नि:शुल्क रहेगा, लेकिन यदि मरीज या उनके परिजन प्रीमियम सुविधाएं चाहते हैं, तो उसके लिए निर्धारित शुल्क देना होगा। इस मॉडल के तहत कॉटेज वार्ड सहित वे सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, जो अभी निजी अस्पतालों में मिलती हैं।
भरोसे और विकल्प की दलील
मेडिकल कॉलेज प्रशासन का तर्क है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर भरोसा करते हैं, लेकिन सुविधाओं के अभाव में निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं। यदि सरकारी अस्पतालों में ही बेहतर सुविधा का विकल्प मिल जाए, तो मरीजों को बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आरएनटी प्रशासन का दावा है कि यदि राज्य सरकार बजट 2026-27 में इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो राजस्थान इस तरह की व्यवस्था लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है।

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