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कोर्ट में चला वीडियो तो पलट गया पूरा केस

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कोर्ट में चला वीडियो तो पलट गया पूरा केस

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हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी— एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग, पुलिस ने गढ़ी “सजावटी कहानी”
राजसमंद, 30 जनवरी:
राजसमंद में एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के नाम पर सड़क का नाम बदलने के विवाद से जुड़े एससी-एसटी एक्ट के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस और परिवादी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। जोधपुर बेंच के जस्टिस फरजंद अली ने स्पष्ट कहा कि संविधान से मिली शक्तियों का इस्तेमाल किसी को प्रताड़ित करने के औजार के रूप में नहीं होने दिया जाएगा। कोर्ट ने पुलिस जांच को “सजावटी कहानी” करार देते हुए कानून के दुरुपयोग की आशंका जताई।
वीडियो ने बदली कहानी, आरोपी बना पीड़ित
मामले में उस समय नाटकीय मोड़ आ गया, जब 28 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट में एक वीडियो क्लिप चलाई गई। वीडियो में साफ दिखा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराने वाला फरियादी ही कथित आरोपी को लात-घूंसों से पीट रहा है। इस ‘लाइव सबूत’ के सामने आते ही आरोपी की गिरफ्तारी पर अड़े पुलिस अधिकारी को कोर्ट में यू-टर्न लेना पड़ा। यह याचिका भरत कुमार दवे की ओर से दायर की गई थी।
पुलिस जांच पर कोर्ट की नाराजगी
जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि पुलिस ने तथ्यों को अपनी सुविधा से चुनते हुए एकतरफा कहानी गढ़ी। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा पहले दिए गए विस्तृत प्रतिवेदन को जांच अधिकारी ने केवल फाइल में नत्थी कर दिया, उस पर कोई ठोस जांच नहीं की गई। इसे कोर्ट ने ‘पूर्व निर्धारित मानसिकता’ का उदाहरण बताया।
कोर्ट का सवाल— चपरासी को ही क्यों दी गालियां?
कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के आरोपों पर गंभीर संदेह जताते हुए कहा कि सड़क नामकरण का विरोध कर रहा व्यक्ति नगर परिषद के जमादार को ही जातिगत गालियां क्यों देगा, जबकि उसका इस फैसले से कोई अधिकारिक लेना-देना ही नहीं था। बिना किसी ठोस मकसद के लगाए गए ऐसे आरोप कानून के दुरुपयोग की ओर इशारा करते हैं।
दो एफआईआर, एक घटना— संयुक्त जांच के आदेश
हाईकोर्ट ने पाया कि एक ही घटना को लेकर दो क्रॉस एफआईआर दर्ज हैं, जिनमें विरोधाभासी तथ्य हैं। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट ने दोनों मामलों की संयुक्त जांच के निर्देश दिए हैं।
सीनियर अफसर करेंगे निगरानी
कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिए कि जरूरत पड़ने पर किसी अतिरिक्त एसपी या वरिष्ठ अधिकारी से जांच की निगरानी करवाई जाए। याचिकाकर्ता को 10 फरवरी तक वीडियो साक्ष्य पेश करने के आदेश दिए गए हैं, वहीं 16 फरवरी तक और निष्पक्ष जांच पूरी होने तक गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई है।

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