छाया लावणी और कथक बैले का अनूठा संगम
Share
सात राज्यों के लोकनृत्यों के कोरियोग्राफ ने लूटी वाहवाही
विभिन्न प्रदेशों के लोक वाद्य यंत्रों के संगम ने शाम बनाई संगीतमय
छत्रपति संभाजी नगर/ उदयपुर। 19 अगस्त
संभाजी नगर का एमआयटी हॉल मंगलवार को देश के विभिन्न राज्यों की कला संस्कृति के अनूठे महासंगम में विभिन्न राज्यों के वाद्य यंत्रों की म्यूजिकल सिम्फनी व कई प्रदेशों के लोकनृत्यों के कोरियोग्राफ की प्रस्तुतियां तो छाई ही, शमा भाटे के मशहूर कथक बैले ‘‘कृष्णा द लिबरेटर’’ और प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रमिला सूर्यवंशी के लावणी नृत्य ने भी दर्शकों के दिलों को झंकृत कर दिया। अवसर था केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर एवं सांस्कृतिक कार्य संचालनालय, मुंबई की ओर से आयोजित दो दिवसीय वारसा सह्याद्रीचा कार्यक्रम के समापन का।
पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र उदयपुर के निदेशक फुरकान खान ने बताया कि देश के विभिन्न राज्यों में केन्द्र की तरफ से इस तरह के महोत्सवों का आयोजन कर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश तक एक-दूसरे की लोक संस्कृति को पहुंचाने का कार्य किया जा रहा है। इससे विभिन्न प्रदेशों के आमजन और कलाप्रेमियों को अन्य राज्यों की लोक कला एवं संस्कृति का पता चलता है। इस कार्यक्रम में मंगलवार को शमा भाटे और प्रमिला सूर्यवंशी जैसी मशहूर नृत्यांगनाओं की उपस्थिति ने चार चांद लगा दिए।
प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना शमा भाटे एंड पार्टी ने अपनी खूबसूरत कथिक बैले प्रस्तुति ‘कृष्णा द लिबरेटर’ में श्रीकृष्ण के संकटों से मुक्ति दिलाने वाले प्रसंगों को निहायत ही बारीकी से उकेरा। शमा भाटे के निर्देशन और अमीरा पाटनकर व अवनी गदरे के नेतृत्व में कुल 14 नृत्यांगनाओं ने मनमोहक भाव भंगिमाओं और सधी हुई लयबद्धकारी से अपनी पेशकश को न सिर्फ नई ऊंचाइयां प्रदान कीं, बल्कि श्रीकृष्ण के कलिया नाग वध, गोवर्धन पर्वत उठाने, कंस वध, माखन चोरी, गोपी वस्त्र हरण करने जैसे प्रसंगों को दिखाते हुए गोप-गोपियों सहित सभी को संकटों से मुक्ति दिला निर्भय होकर जीने का संदेश दिया। इतना ही नहीं, कथक बैले की अनूठी प्रस्तुति में श्रीकृष्ण के पर्यावरण प्रेम, रूढ़िवादिता का विरोधी रूप को भी बारीकी से अभिव्यक्त किया गया। इस प्रस्तुति ने न सिर्फ दर्शकों को पूरी तरह सम्मोहित रखा, बल्कि खूब वाहवाही भी लूटी।
कार्यक्रम में महाराष्ट्र के लावणी नृत्य ने भी दर्शकों को सम्मोहित तो किया ही, साथ ही द्रुत संगीत और लयकारी पर थिरकती प्रसिद्ध नृत्यांगना प्रमिला सूर्यवंशी की भाव भंगिमाओं ने ठेठ मराठा शैली को छू लिया। इस पर दर्शकों ने कई बार हॉल को तालियों से गूंजायमान कर दिया। दरअसल लावणी महाराष्ट्र का प्रचलित गीत और नृत्य का ऐसा अनूठा संयोजन है जो ढोलकी और एक ताल वाद्य यंत्र की थाप पर किया जाता है। महाराष्ट्र के अलावा दक्षिण मध्यप्रदेश में भी नौ गज लंबी साड़ी (लुगाडे) पहनकर किया जाने वाला यह नृत्य बहुत प्रचलित है।
सिम्फनी और कोरियोग्राफ का छाया जादू –
कार्यक्रम में राजस्थान के लोक वाद्यों की डेजर्ट सिम्फनी में खरताल, पुंगी (बीन), चौतारा, कामायचा, सारंगी, मटका, बाजा (हारमोनियम), ढोलक, मोरचंग के साथ कच्छ की वीणा, जोड़िया पावा, गमेलू, मंजीरा तथा महाराष्ट्र की नाळ व तुतारी (बिगुल) का अनूठा म्यूजिकल सम्मिश्रण सुनकर श्रोता झूम उठे। साथ ही, महाराष्ट्र की तुतारी की गूंज के बाद संतोष नायर द्वारा निर्देशित कोरियोग्राफ प्रस्तुति में मराठी गोंधळ, गोवा के समई, महाराष्ट्र के लावणी, राजस्थान के चरी व कालबेलिया, गुजरात के राठवा और सिद्दी धमाल, मणिपुर के पुंग ढोल चोलम, पश्चिम बंगाल के पुरूलिया के नटुआ, पंजाब के भांगड़ा नृत्यों के अनूठे संगम को देख हॉल में मौजूद सैकड़ों दर्शक वाह वाह कर उठे और समूचा हॉल प्रस्तुति के दौरान कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
