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जो घर–परिवार नहीं बसा पाते, उनका सहारा बना उदयपुर का नारायण सेवा संस्थान

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जो घर–परिवार नहीं बसा पाते, उनका सहारा बना उदयपुर का नारायण सेवा संस्थान

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अब तक 2459 निर्धन–दिव्यांग जोड़ों का संवर चुका है भविष्य, अब 44वाँ सामूहिक विवाह 30–31 अगस्त को

सुभाष शर्मा
उदयपुर। 25 अगस्त

जिनके जीवन में गरीबी और दिव्यांगता जैसे हालात विवाह जैसे पवित्र संस्कार को भी सपना बना देते हैं, उनके लिए ‘नारायण सेवा संस्थान’ आशा की सबसे बड़ी किरण बनकर सामने आया है। समाज की मुख्यधारा से कटे इन साथियों को न केवल आत्मनिर्भर बनाया गया, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक दांपत्य जीवन की शुरुआत करने का अवसर भी दिया गया।
अब तक संस्थान 43 सामूहिक विवाह समारोहों के माध्यम से 2459 निर्धन और दिव्यांग जोड़ों को वैवाहिक जीवन से जोड़ चुका है। इस क्रम में आगामी 30 और 31 अगस्त को संस्थान का 44 वाँ नि:शुल्क सामूहिक विवाह समारोह सेवा महातीर्थ, लियों का गुड़ा (उदयपुर) परिसर में आयोजित होने जा रहा है, जिसमें 51 नवयुगल विवाह बंधन में बंधेंगे।

सिर्फ शादी नहीं, आत्मबल और प्रेम की मिसाल
संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने बताया कि इस समारोह में शामिल जोड़े कोई आम जोड़े नहीं हैं। कोई नेत्रहीन है, तो कोई चलने–फिरने में असमर्थ। कई ऐसे भी हैं, जिनमें एक साथी दिव्यांग है और दूसरा सकलांग। परंतु हर जोड़ा इस बात का साक्ष्य है कि –”सच्चा जीवनसाथी वह है, जो आत्मा और मन से जुड़ा हो, शरीर से नहीं।”
दो दिवसीय विवाह महोत्सव का कार्यक्रम
इस साल 30 अगस्त की सुबह पद्मश्री कैलाश ‘मानव’, कमला देवी और प्रशांत अग्रवाल की उपस्थिति में गणपति स्थापना के साथ समारोह का शुभारंभ होगा। दिनभर मेहंदी, संगीत और बिंदोली जैसे पारंपरिक आयोजन उत्सव को रंगीन बनाएंगे।
31 अगस्त को तोरण, वरमाला और सात फेरे वैदिक रीति-रिवाजों के साथ होंगे और 51 युगल पाणिग्रहण संस्कार के बाद जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे।
वैदिक मंत्रों की गूंज और मानवीय करुणा की झलक
विवाह मंडप में 51 वेदियाँ सजाई जाएँगी, जहाँ आचार्य वैदिक मंत्रों के साथ विवाह संस्कार कराएँगे। कन्यादान के भावुक क्षण, अग्नि के सात फेरे और मंगलसूत्र की डोर—ये सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रचेंगे, जो धार्मिक ही नहीं, मानवीय संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी की सबसे सशक्त तस्वीर बनेगा।
नवजीवन के साथ गृहस्थी का उपहार
नवविवाहितों को संस्थान की ओर से गृहस्थी की संपूर्ण सामग्री भेंट की जाएगी—जिसमें पलंग, बर्तन, सिलाई मशीन, पंखा, चूल्हा, बिस्तर, श्रृंगार सामग्री आदि शामिल हैं। प्रशांत अग्रवाल कहते हैं कि यह केवल वस्तुएँ नहीं, बल्कि एक सशक्त और आत्मनिर्भर भविष्य की नींव है।
डोली में विदा और आत्मनिर्भरता की ओर प्रस्थान
समारोह का सबसे भावुक क्षण तब आएगा, जब बेटियाँ प्रतीकात्मक डोली में बैठकर अपने जीवनसाथी संग विदा होंगी। संस्थान की ओर से उन्हें सम्मानपूर्वक उनके गृहग्राम तक पहुँचाने की विशेष व्यवस्था की गई है। यह न केवल एक विदाई है, बल्कि समाज को यह संदेश भी है कि—”हर बेटी, चाहे वह निर्धन हो या दिव्यांग, उसे भी वही सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए जो किसी भी अन्य कन्या को मिलते हैं।”

सामूहिक विवाह में तीन जोड़ों की प्रेरक गाथा

सकलांग नरेंद्र थामेगा दिव्यांग नीला का हाथ
फलासिया तहसील की नीला कुमारी, सात वर्ष की उम्र में मधुमक्खी के दंश से बीमार हुईं। समय के साथ पैर घुटनों से टेढ़े होते गए और चलने में असहनीय पीड़ा होने लगी। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि इलाज संभव नहीं हो सका, फिर भी नीला ने हार नहीं मानी। स्नातक तक की पढ़ाई पूरी कर घर के कामों में माँ का हाथ बँटाने लगीं।
विवाह की बात आते ही लोग उन्हें उनके शारीरिक हालात के कारण अस्वीकार कर देते थे। लेकिन नियति ने कुछ और तय कर रखा था। पास के आमलिया गाँव के नरेंद्र कुमार भगोरा, जो निर्धन परिवार से हैं और मजदूरी कर परिवार का पालन करते हैं, नीला से एक दिन बातचीत में जुड़ गए। जब नीला ने अपनी दिव्यांगता के बारे में बताया, तो नरेंद्र ने सहजता से कहा— “कोई बात नहीं।”
धीरे-धीरे रिश्ता गहराया और अब ये दोनों संस्थान की मदद से विवाह बंधन में बंधने जा रहे हैं।

दिव्यांग बखतराम और सविता की जोड़ी बनी संघर्ष की मिसाल
प्रतापगढ़ जिले के बखतराम (24) बचपन से ही जन्मजात टेढ़े पैरों के कारण दिव्यांग हैं, फिर भी मुंबई की एक होटल में काम कर आत्मनिर्भर जीवन जी रहे हैं। वहीं सविता (18), जिनकी गर्दन जन्म से टेढ़ी है, शारीरिक चुनौतियों के बावजूद हिम्मत से जीवन जी रही हैं।
इन दोनों की मुलाकात बखतराम की भाभी के जरिए हुई, जो जल्द ही दोस्ती और फिर रिश्ते में बदल गई।
आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण परिवारों ने नारायण सेवा संस्थान में संपर्क किया और विवाह का पंजीकरण करवाया। अब यह जोड़ी एक-दूसरे की कमजोरी नहीं, ताकत बनकर जीवन की नई शुरुआत करने जा रही है।

परस्पर मुस्कान में सुकून तलाशती शकुंतला और गणेश की जोड़ी
डूंगरपुर की शकुंतला कटारा दोनों पैरों से दिव्यांग हैं, चलने के लिए उन्हें घिसटना पड़ता है। बावजूद इसके उन्होंने घर के सारे कार्यों में दक्षता पाई और कभी हार नहीं मानी। उम्र बढ़ती गई और विवाह की उम्मीदें धूमिल होने लगीं।
इसी बीच डूंगरपुर में दिव्यांगजनों की एक बैठक में उनकी मुलाकात हुई गणेश लाल से, जो पीठ में कूबड़ के साथ जीवन से लड़ते हुए आगे बढ़े हैं। यह परिचय दोस्ती में बदला और फिर दोनों ने एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में अपनाने का निर्णय लिया।
अब शकुंतला और गणेश संस्थान के सामूहिक विवाह समारोह में विवाह बंधन में बंधेंगे, जहाँ वे एक-दूसरे के सहारे, एक-दूसरे की मुस्कान में सुकून पाएंगे।

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